घाटे, आलोचनाएं और उद्यमशीलता की नई परिभाषा: कुणाल शाह की कहानी
भूमिका: एक बहस की शुरुआत
भारत में स्टार्टअप्स की दुनिया तेज़ी से बदल रही है। आज हम ऐसे दौर में हैं जहां एक विचार लाखों लोगों की ज़िंदगी बदल सकता है, और एक एप कुछ ही वर्षों में अरबों की वैल्यूएशन हासिल कर सकता है। लेकिन इसी दुनिया में एक गंभीर बहस भी चल रही है — क्या घाटे में चलने वाले स्टार्टअप्स को सफल माना जा सकता है? क्या लाभ (Profit) ही सफलता का असली पैमाना है?
यह बहस हाल ही में और तेज़ हो गई जब एक लिंक्डइन पोस्ट में प्रसिद्ध भारतीय उद्यमी कुणाल शाह पर सवाल उठाए गए। उनसे पूछा गया कि आखिर क्यों एक ऐसे व्यक्ति का जश्न मनाया जाए जिसकी कंपनियां — फ्रीचार्ज और क्रेड — सालों से घाटे में चल रही हैं? इस सवाल ने सोशल मीडिया पर एक ज़बरदस्त प्रतिक्रिया उत्पन्न की।
कुणाल शाह ने इस आलोचना का जवाब भी उतने ही दमदार तरीके से दिया। उन्होंने न सिर्फ अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट किया, बल्कि एक व्यापक बहस को जन्म दिया कि आज के युग में उद्यमिता को किस नजरिए से देखा जाना चाहिए।
आइए इस पूरे घटनाक्रम को विस्तार से समझते हैं।
फ्रीचार्ज और क्रेड: दो कहानियां, एक मकसद
फ्रीचार्ज की शुरुआत और यात्रा
साल 2010 में, जब भारत में डिजिटल भुगतान की शुरुआत ही हो रही थी, उस समय कुणाल शाह ने फ्रीचार्ज (FreeCharge) की स्थापना की। फ्रीचार्ज ने मोबाइल रिचार्ज को एक नया रूप दिया — एक ऐसा अनुभव जिसमें रिचार्ज करने पर कैशबैक और ऑफ़र मिलते थे।
इस मॉडल ने युवाओं के बीच काफी लोकप्रियता पाई। 2015 तक कंपनी ने ₹35 करोड़ की कमाई की, लेकिन साथ ही ₹269 करोड़ का घाटा भी झेला।
2015 में फ्रीचार्ज को Snapdeal ने ₹2800 करोड़ में खरीदा। लेकिन यह सफलता ज्यादा टिक नहीं सकी। कुछ वर्षों में ही फ्रीचार्ज की वैल्यू गिरकर मात्र ₹370 करोड़ रह गई, और 2017 में इसे Axis Bank ने खरीद लिया।
यह सवाल उठता है: क्या यह एक असफलता थी या फिर एक सीख?
CRED की नई सोच
2018 में कुणाल शाह ने फिर एक नई शुरुआत की — इस बार CRED के साथ। CRED एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जो उपयोगकर्ताओं को समय पर क्रेडिट कार्ड बिल चुकाने पर रिवॉर्ड देता है। शुरू में इस आइडिया को समझने में लोगों को समय लगा, लेकिन धीरे-धीरे यह शहरी युवाओं और प्रोफेशनल्स के बीच लोकप्रिय हो गया।
CRED अब न सिर्फ बिल पेमेंट, बल्कि लोन, निवेश, और यहां तक कि शॉपिंग के विकल्प भी प्रदान करता है।
हालांकि, वित्तीय आंकड़े फिर सवालों में हैं — CRED ने अब तक ₹4,439 करोड़ की कमाई की है, लेकिन ₹5,215 करोड़ का घाटा भी सहा है।
आलोचना का केंद्र: एक लिंक्डइन पोस्ट
इस बार बहस की शुरुआत एक लिंक्डइन उपयोगकर्ता आदर्श समलोपनन की पोस्ट से हुई। वे डेलॉइट के वरिष्ठ सलाहकार हैं और उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह सवाल उठाया:
“पंद्रह वर्षों के बाद भी कुणाल शाह के किसी भी उपक्रम ने लाभप्रदता नहीं दिखाई — फिर हम उनका इतना महिमामंडन क्यों करते हैं?”
उन्होंने FreeCharge और CRED, दोनों के घाटों का हवाला देते हुए यह पूछा कि क्या सिर्फ वैल्यूएशन ही सफलता का पैमाना है?
कुणाल शाह का जवाब: लाभ नहीं, लेकिन जोखिम और प्रभाव
कुणाल शाह ने इस आलोचना का जवाब बहुत ही संतुलित और सोच-समझकर दिया। उन्होंने कहा:
“बिल्कुल सही। हमें उन हज़ारों उद्यमियों का जश्न मनाना चाहिए जिन्होंने बाहरी पूंजी के बिना लाभदायक कंपनियाँ बनाई हैं। लेकिन हमें उन लोगों का भी सम्मान करना चाहिए जो जोखिम ले रहे हैं।”
शाह ने यह तर्क दिया कि उद्यमिता केवल लाभ की बात नहीं है। यह नवाचार, रोजगार सृजन, और समाज में बदलाव लाने की क्षमता का भी प्रतिनिधित्व करती है।
उन्होंने आगे कहा:
“AI के युग में नौकरी करना और भी अधिक जोखिम भरा हो सकता है। हमें और अधिक रोजगार उत्पन्न करने वालों की आवश्यकता है, और यही स्टार्टअप्स का असली उद्देश्य होना चाहिए।”
नेटिज़न्स की प्रतिक्रिया: समर्थन और चिंता दोनों
कुणाल शाह की प्रतिक्रिया के बाद लिंक्डइन पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। कुछ लोग उनके समर्थन में खड़े रहे, जबकि कुछ ने उनकी आलोचना जारी रखी।
समर्थन में तर्क
- भानु प्रताप सिंह, कैशक्राई के CEO ने लिखा:
“कुणाल शाह ने ऐसे प्लेटफॉर्म बनाए हैं जिन्होंने डिजिटल भुगतान और क्रेडिट संस्कृति को बढ़ावा दिया है। उन्होंने नौकरियां दी हैं, निवेशकों को रिटर्न दिलाया है और एक पीढ़ी को जोखिम लेने की प्रेरणा दी है।”
- कुछ यूज़र्स ने यह भी तर्क दिया कि Amazon, Uber जैसी कंपनियां भी कई वर्षों तक घाटे में रहीं, लेकिन उन्होंने बाजार में गहरा प्रभाव डाला और बाद में लाभप्रद बन गईं।
आलोचनात्मक विचार
- कुछ यूज़र्स ने चेतावनी दी कि स्टार्टअप्स के घाटे को “सामान्य” मानना एक खतरनाक प्रवृत्ति है।
- एक यूज़र ने लिखा:
“केवल वैल्यूएशन के आधार पर संस्थापकों का महिमामंडन करना स्थायी विकास की दिशा में गलत संकेत देता है।”
उद्यमिता की बदलती परिभाषा
यह बहस एक बड़े सवाल को जन्म देती है: क्या लाभप्रदता ही किसी स्टार्टअप की सफलता का पैमाना है?
भारत में अब तक उद्यमिता को बहुत हद तक दो बातों से आंका गया है — वैल्यूएशन और फंडिंग। लेकिन अब समय आ गया है कि हम इसका मूल्यांकन कुछ और पहलुओं से भी करें:
- रोज़गार सृजन: क्या स्टार्टअप लोगों को नौकरियाँ दे रहे हैं?
- सामाजिक प्रभाव: क्या वे समाज में कोई बदलाव ला रहे हैं?
- प्रौद्योगिकी और नवाचार: क्या वे तकनीकी समाधान प्रदान कर रहे हैं जो लंबी अवधि में उपयोगी हैं?
- यूज़र वैल्यू: क्या वे उपयोगकर्ताओं की जिंदगी को आसान बना रहे हैं?
सवाल जरूरी हैं, लेकिन प्रेरणा भी
कुणाल शाह की यात्रा एक आदर्श उदाहरण है कि कैसे किसी व्यक्ति की सोच, भले ही परंपरागत वित्तीय नियमों के अनुरूप न हो, फिर भी समाज में व्यापक प्रभाव डाल सकती है। हां, आलोचना ज़रूरी है — घाटे पर सवाल उठना चाहिए। लेकिन यह भी उतना ही ज़रूरी है कि हम उन लोगों को प्रोत्साहित करें जो कुछ नया कर रहे हैं, जोखिम उठा रहे हैं, और भविष्य की दिशा तय करने की कोशिश कर रहे हैं।
भारत जैसे देश में जहां नौकरी की अपेक्षा उद्यमशीलता को अब भी एक जोखिम माना जाता है, वहां ऐसी बहसें हमारे सोचने का नजरिया बदल सकती हैं।
शायद हमें लाभ से आगे जाकर यह भी पूछना चाहिए — क्या यह स्टार्टअप दुनिया को बेहतर बना रहा है?
✍🏻 लेखक का संदेश:
अगर आप भी उद्यमिता की राह पर हैं या शुरुआत करना चाहते हैं, तो याद रखें कि हर व्यवसाय की अपनी यात्रा होती है। लाभ ज़रूरी है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है — आपका दृष्टिकोण, साहस और समाज में फर्क लाने की चाह।