RTI Activist Buried Under 37,000 Pages in Haryana

📢 प्रस्तावना: जब पारदर्शिता बनी बोझ!

आज के आधुनिक युग में सूचना का अधिकार (RTI) नागरिकों को सरकारी कार्यों में पारदर्शिता लाने का एक ताकतवर हथियार बनकर सामने आया है। लेकिन क्या होता है जब इस अधिकार को व्यवहार में उतारने में ही एक अभूतपूर्व बाधा आ जाए? जब आप ही जानकारी की जांच करते-करते जानकारी के डिजास्टर में खो जाने लगें? हरियाणा के कुरुक्षेत्र से आने वाले आरटीआई कार्यकर्ता पंकज अरोड़ा ने इसी सामोल–जंजाल से भरी कहानी को सामने रखा है—जिसमें जानकारी मिलने की बजाय मिली एक 37,443 पेज की 10८ किलो का कागज और 80,000 रुपये।

यह कहानी सीधे तौर पर उस सवाल को उठाती है: क्या सूचना का अधिकार सचमुच ही जनता का अधिकार है, या फिर केवल कागज़ के पहाड़ों में दफ़न एक सुविधा?

📝 मामला: शुरूआत कहाँ से हुई?

30 जनवरी 2025 को पंकज अरोड़ा ने पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट (PHED), हरियाणा के खिलाफ एक RTI आवेदन दर्ज कराया। उनके प्रश्न काफी सीधी प्रवाह वाली थीं, और उन्होंने इसके तहत मांगी गई जानकारी की श्रेणियाँ थीं:

  1. जबरदस्त निविदाएँ (टेंडर)
  2. ठेकेदार लाइसेंस और नियुक्तियाँ
  3. वित्तीय लेन-देन—जैसे जीएसटी भुगतान
  4. हरियाणा कौशल रोजगार योजना से जुड़े आंकड़े
  5. 2023–2025 के विभागीय व्यय एवं प्रकाशन रिकॉर्ड

पंकज का उद्देश्य सीधा था: PHED में संभावित भ्रष्टाचार और छुपे फाइनेंशियल गलतियों को उजागर करना।

🎯 जवाब में मिला—कागज़ों का पहाड़!

लेकिन छह महीने बाद, 6 जून 2025 को उन्हें मिला—37,443 पेज की दस्तावेज़ राशि, जिसका वजन 108 किलोग्राम था! इस विशाल सामग्री के मिलने पर उनका कहना था:

“मुझे वही जानकारी नहीं मिली, जो मैंने मांगी थी। इसके जगह सिर्फ एक भारी आंखों को तोड़ देने वाला कागज़ों का ढेर है।”

इस विशाल कागज़ के साथ ही PHED ने उन्हें एक 80,000 रुपये की फीस का बिल भेजा—जो बाद में बदलाव का शिकार हुआ।

💸 फीस विवाद और दोहरा संदेश

जब अरोड़ा ने 10,000 रुपये डिमांड ड्राफ्ट और 70,000 रुपये का बैंकर्स चेक जमा किया, विभाग ने इस भुगतान को स्वीकार नहीं किया। PHED ने बाद में दलील दी कि:

  • भरे गए चेक/ड्राफ्ट का नाम पात्र नहीं था,
  • भुगतान नहीं होने के कारण कागज़ों की तैयारियों में देरी हो गई

दूसरी ओर पंकज ने पुष्टि की कि उनका चेक और ड्राफ्ट सही तरीके से बैंक जमा हुए, लेकिन PHED ने “इकोरेट” रूप से उन्हें खाता नहीं लिया।

📂 37,443 पेज—क्या वास्तव में उपयोगी?

दस्तावेज़ों के पूरे पहाड़ को खोलकर देखने पर पता चला:

  • इनमें ज़्यादातर पेज ठेकेदारों के समझौते, अप्रासंगिक फाइलें और कागज़ी नकलें थीं—जो मूल में मांगे गए न थे।
  • परियोजना की निविदा प्रक्रिया, जीएसटी रिकार्ड, ऑडिट रिपोर्ट—जो कि मुख्य जानकारी थी—वे गायब थीं।

उन्होंने आरोप लगाया कि विभाग का यह तंत्र—जानबूझकर जानकारी की पारदर्शिता को ढकेला देने या उसका बोझ बना देने का प्रयास है।

🚨 क्या उद्देश्य था डराना?

पंकज का कहना है कि यह रणनीति बनाकर उन पर भारी फीस और कागज़ों का बोझ डालकर उन्हें थका देना और हतोत्साहित करना था। ऐसा लग रहा था जैसे विभाग ये मानकर चल रहा था कि:

  • “80,000 रुपये कोई नहीं देगा”
  • “बड़ी बावत भारी दस्तावेज़ प्राप्त करेगा और चल पड़ जाएगा”
  • लेकिन जब अरोड़ा ने भुगतान किया, तब उन्हें तोड़ देने की रणनीति बनाई।

🏛️ दलील में विभाग की जवाब

PHED के कार्यकारी अभियंता सुमित गर्ग ने प्रतिक्रिया में कहा कि:

“हमने 4 0,000 पेज जानकारी तैयार की, सरकारी नियमों के अनुसार 2 रु. प्रति पेज के हिसाब से फीस बनी।”
“ड्राफ्ट/चेक में नामांकन त्रुटि थी, इसलिए जमा नहीं किया गया।”

उन्होंने यह भी कहा कि क्योंकि अरोड़ा ने केवल “सामान्य प्रतियाँ” मांगी थीं, विभाग ने इलेक्ट्रॉनिक फॉर्मेट्स शामिल नहीं किया।

लेकिन पंकज कहते हैं कि उन्होंने स्पष्ट रूप से ‘डिजिटल प्रतियाँ’ की मांग की थी—पर उनकी मांग को अनसुना किया गया।

🌐 डिजिटल बनाम ऑफ़लाइन: एक विरोधाभास

पंकज ने भरोसा जताया कि वे डिजिटल India अभियान के अनुरूप अधिक से अधिक डिजिटल दस्तावेज प्राप्त करना चाहते थे—ताकि कागज़ी बोझ से बचा जा सके। पर मिला एक 100+ किलो का दस्तावेज़ी बोझ, जो कि उद्देश्य की पराजय है।

फ़िर सवाल उठता है—क्या सूचना का अधिकार सिर्फ रोजमर्रा की सीमित पारदर्शिता तक ही सीमित रह गया है? या फिर मशीनों और बड़े कागज़ों की दुनिया में खो गया है?

🧭 RTI कार्यकर्ता की अपील: राज्य सूचना आयोग

घण्टों के विश्लेषण के बाद, पंकज ने राज्य सूचना आयोग, चंडीगढ़ में अपील दर्ज कराई। आयोग ने उनकी याचिका स्वीकार कर ली है और अब इसे न्यायालयी प्रक्रिया के तहत आगे ले जाया जा रहा है।

यह लड़ाई सिर्फ एक व्यक्ति की जानकारी की तलाश नहीं है, बल्कि RTI के मूल रूप—पारदर्शिता, जवाबदेही, सार्थक सूचना की रक्षा की भी लड़ाई है।

🎙️ पंकज के शब्दों में:

  • “ये अब तक का सबसे बड़ा दस्तावेज़ किसी RTI कार्यकर्ता को मिला।”
  • “मुझे डराने की यह चाल चली, लेकिन मैं इससे पीछे नहीं हटूंगा।”
  • “अगर कागज़ बोझ नहीं, तो जानकारी कहीं खो गई है।”

उनकी आवाज़ है—एक एकल साक्षी की आवाज़ जो सच्चाई की खोज में अडिग है।

🧩 सारांश में क्या खोट है?

मुद्दासंक्षिप्त विवरण
भारी कागज़ / बोझ37,443 पेज, 108 किग्रा कागज़
बड़ी फीसशुरुआती 85k, बाद में घटाकर 80k रुपए
गलत भुगतान नामकरणड्राफ्ट/चेक पर गलत नाम
अप्रासंगिक दस्तावेजमुख्य मांगे बिना पूरी जगह पर कागज़
मूल दस्तावेजों की अनुपस्थितिनिविदा प्रक्रिया, जीएसटी, ऑडिट अपडेट गायब
राज्य सूचना आयोग में अपीलमामला अब उच्च न्यायिक समीक्षा में

❓ RTI कानून—क्या कहता है?

RTI कानून का उद्देश्य है:

  1. सरकारी निर्णयों में पारदर्शिता
  2. लोगों को जानकारी का अधिकार
  3. सरकारी मशीनरी में जवाबदेही और विश्वास बढ़ाना

लेकिन यह तभी संभव है, जब:

  • मांग अनुसार सटीक जानकारी हो,
  • बिना आरोपित भ्रम,
  • विनियमित और समय पर प्रक्रिया हो,
  • और कम से कम बोझ हो—चाहे डॉक्यूमेंट हो या आर्थिक।

🧭 भविष्य की राह: सीख और सुझाव

  1. सूचना आयोग के स्पष्ट दिशा-निर्देश—मतलब “जो मांगो वही दो”
  2. डिजिटल अभिलेख—RTI के जवाब में प्राथमिक विकल्प
  3. फीस संरचना में लचीलापन—विशेषकर उन कामों में जहां पर सूचना नगण्य हो
  4. मुख्य दस्तावेज़ की उपलब्धता सुनिश्चित करना—मुख्य तथ्य, ऑडिट, जीएसटी, निविदा प्रक्रिया
  5. अभिलेखों में ‘फटर-पैराफ़’ युक्त स्पष्टता—क्या महत्त्वपूर्ण है और क्या संदर्भ मात्र?

यह सुधार से ही RTI का ‘हक़’ फिर से उसका मूल स्वरूप पा सकता है—जहाँ जनता नियंत्रक बनी और सरकारी तंत्र जवाबदेह।

पंकज अरोड़ा की यह कहानी एक चेतावनी है:

  • यह दिखाती है कि सूचना का अधिकार कैसे बोझ और भ्रम पैदा करने के उपकरण में बदल सकता है।
  • सरकार की कागज़ आधारित प्रक्रियाओं से पारदर्शिता की मूल सोच पीछे छूट रही है।
  • यह एक ऐसी लड़ाई है जिसमें वह आवाज़ भी शामिल है, जो जाने-अनजाने सबसे प्रभावी सत्य का प्रतिनिधित्व करती है।

RTI का असली उद्देश्य सिर्फ दस्तावेज प्राप्त करना नहीं है, बल्कि एक सशक्त और जवाबदेह लोकतंत्र का निर्माण करना है। पंकज की इस जंग में, हमें उस आवाज़ को पहचानने और उसके पीछे लोकतंत्र की मूल शक्ति—जनता की शक्ति—को सतर्कता से बनाए रखने की जिम्मेदारी है।

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