निमिषा प्रिया की कहानी न केवल एक कानून की लड़ाई है, बल्कि एक माँ की आँसूओं से भीगी दास्तान, एक बेटी की दरिंदगी में छुपी पीड़ा, और एक समाज की नैतिक विवशताओं का आईना है। यह संघर्ष 2019 से देशों की सीमाओं, अदालतों की गुमराहियों, और अनगिनत अनिद्रा भरी रातों से होकर गुज़रा। मगर असली जज़्बा और लड़ाई तो उससे भी पहले शुरू हुई—एक आदमी की ज़िद, समर्पण और मानवीय सेवा की वजह से।
✨ 1. संघर्ष की शुरुआत: प्राथमिक खबर से संघर्ष की जड़ तक
सब कुछ जल्दी ने शुरू हुआ जब 2018 में खाड़ी आधारित मानवतावादी सम्यूल जेरोम भास्कर ने, जो कि एक सच्चे हिंदुस्तानी मूल के, तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री मेजर जनरल वीके सिंह से मिलने कोलकाता में आग्रह किया। उन्होंने भगोड़ी खबरों की अनदेखी और रिपोर्टिंग की भारी कमी के बीच एक मजबूत सिकंदर बन, अपनी आवाज़ उठाई जिससे कि दुनिया को पता चले—निमिषा एक मुश्किल हालात में है। उसी वर्षों, उन्होंने मलयालम मणोरमा के पत्रकार रोनी को इंटरव्यू दिया, जिसने मामले को केरल में मानवीय संवेदना से जोड़ा, जागरूकता पैदा की और मीडिया का फोकस पाने में योगदान दिया।
उनके प्रयासों ने नींव ठाल दी—सार्वजनिक ध्यान, मीडिया की जुबानी, और राजनयिक पहल को आकार—जिससे इस मिशन में जानकारियाँ और ताक़तें जुड़ने लगीं।
💭 2. एक “छोटी सी खबर” – एक व्यक्ति की ज़िद
2019 में मैंने किसी लोकल अख़बार में निमिषा संंबंधित सिर्फ एक छोटी सी क्लिपिंग देखी। उसमें लिखा था—“भारतीय नर्स को जेल व अभी सजा का सामना।” लेकिन वो सिर्फ शब्द नहीं थे, मेरे अंदर एक कोमल सी आवाज़ भर दी कि “ये मामला तुम्हारा है।”
इन्हीं शब्दों ने मेरे भीतर जिंदा भावना को जकड़ लिया—मैं अपंग नहीं रह सकता था। और इस तरह शुरू हुआ मेरा अथक, अनवरत और दिल-दिमाग तक झकझोर देने वाला सफर—
- निमिषा की खोज से जुड़ाव तक की यात्रा
- 2019–2020 का बहु-पक्षीय संघर्ष
- केरल से सना तक: संघर्ष का विस्तार और गहराई
और इस सफर में सिर्फ कानूनी लड़ाई ही नहीं थी—बल्कि भावनात्मक जज़्बा, रिकार्डिंग मजबूती, और हर मोड़ पर सामर्थ्य जुटानी थी।
🕵️♀️ 3. परिवार से अपील: खुद को इस लड़ाई का हिस्सा मानना
2020–2021 आते-आते, मैं निमिषा के पारिवारिक मंडल—माँ प्रेमा कुमारी, पति टोमी और बेटी मिशेल—तथा स्वयं निमिषा तक पहुंच गया। निमिषा एक साधारण तिनके की तरह परिवार से आती है। माँ, जो विधवा है, किन्नौरिया के घरों में नौकरानी का कार्य करती थी—उन्होंने गरीबी रेखा से नीचे से भी खेती करते हुए अपनी ज़मीनी जायदाद को बेच दिया ताकि ज़मैंदारों—अदालत अभियोजनों—वकीलों—और अन्य सहयोगकर्ताओं के लिए खर्च जुट सकें।
हर बार जब मैं नाममात्र के खर्च खत्म हो जाते थे, तब प्यार—गाँठ—और देशभक्ति ने संयुक्त हमें बचाए रखा। केरल के कुशल स्वतंत्र सहायता पहलों ने धीरे-धीरे सबकुछ मजबूत किया—एक नया नेटवर्क—मीडिया प्रचार—और सुदृढ़ संसाधन हमारे परिवार के समर्थन में शामिल हुए।
📲 4. जेल से संवाद: न्याय तक की मुस्किल भरी राह
एक कठोर तथ्य—निमिषा सना केंद्रीय जेल में कैद थी—कठोर बंदिशों में बंद—किसी से बातचीत करना मुमकिन भी नहीं। लेकिन मेरी हिम्मत ने वो भी हरा दिया:
- 2020 में मैंने सफलतापूर्वक जेल के अंदर उसके संपर्क स्थापित कर लिया।
- अनुवर्ती बातचीत में, निमिषा ने मुझे बताया कि सम्यूल उनके साथ 2017 से जुड़े हुए हैं।
- 28 मई 2020 को सम्यूल से पहली बार Google Duo कॉल की, जिसने हमारे बीच एक नई लड़ाई की प्रेरणा जलाई।
उस कौर में हमने शपथ ली—“हम तब तक लड़ेंगे, जब तक निमिषा घर नहीं लौट पाती।” यह पवित्र मंसूबा हमारी राह की मशाल बन गया।
🧑⚖️ 5. कानूनी मुक़दमा: कड़े फैसलों से चुनौतियों तक
- सितम्बर 2020 में यमन की अपील अदालत ने निमिषा की फाँसी की सज़ा को बरकरार रखा।
- इस फैसले के बाद, सम्यूल, बदर, नाफ़ी और मैंने यमन हाई कोर्ट की दरख्वास्त की—भारतीय दूतावास के वकील श्री अब्दुल्ला एजजी अमीर की मदद से।
- उससे पहले मददगार थे—अडवोकेट अब्दुल करीम, जिन्होंने 2017–2020 के बीच निमिषा का संघर्ष लड़ाया।
लेकिन धीरे-धीरे स्पष्ट हो गया कि केस की जटिलता ज्यादा गहरी है—हाई ट्रांसपेरेंसी, राजनैतिक रणनीति, अनुभव और देशी-विदेशी सहायता जरूरी थी।
इसलिए हमने भारतीय विदेश मंत्रालय को संलग्न किया—ताकि एक अनुभवी, योग्य वकील नियुक्त किया जा सके।
🛡️ 6. Save Nimisha Priya Action Council: सार्थक पहल
अक्टूबर 2020 को, संघर्ष ने एक नई पहचान पाई—“Save Nimisha Priya Action Council”—जो बनी:
- एक कानूनी, मानवीय, और राजनैतिक कार्यशक्ति
- साथ ही एक जनसंपर्क समूह जिसने crowdfunding का रास्ता अपनाया—राष्ट्रीय मीडिया को जोड़कर
- शजन स्कारिया (मरुणादन मलयाली) की सक्रिय भूमिका ने जन समर्थन और पहल की रफ्तार बढ़ाई।
👩⚖️ 7. 2023–2024 का बढ़ता आंदोलन
- 2023 – हमने दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया—निमिषा की माँ को यमन जाकर उससे मुलाक़ात करने की अनुमति दिलवाई। न्यायालय ने हामी भरी और माँ–बेटी मिल सकीं।
- तब से माँ पूरी तरह यमन में हैं—जेल में नियमित मुलाक़ात और स्थानीय जनसमुदाय—जातीय नेताओं के साथ बातचीत जारी रखी जा रही है।
🌍 8. दूतावास और मीडिया का साथ | राजनीतिक नेतृत्व
2022–2024 में अम्बेसडर डॉ. चंद्र मौली ने हमारा साथ दिया।
उन्होंने हमें यमन के जनजातीय न्याय प्रणाली के जटिल सिद्धांतों से अवगत कराया।
उनके मार्गदर्शन से समझ सके—
- प्री-नेगोशिएशन: प्रारंभिक मुहिम की रस्में तथा लोकमानव की स्वीकृति
- फॉर्मल नेगोशिएशन: आदिवासी नेतृत्व एवं शेखों के समक्ष तर्क और वापसी की गारंटी
हमारे स्थानीय वकील अब्दुल्ला एजजी अमीर और सम्यूल भास्कर, जिन्होंने Power of Attorney ली है, राजनैतिक—कानूनी—सामाजिक—हर मोर्चे पर स्थानीय दखल कर रहे हैं।
💸 9. धनराशि, विवाद और डायल (क्षतिपूर्ति राशी)
- सितम्बर 2024 – विदेश मंत्रालय के आदेश पर USD 20,000 का पहला किश्त यमन भेजा गया ताकि pre-negotiation rituals शुरू हो सकें।
- लेकिन दो Action Council के सदस्यों ने गलत और फ़रज़ी आरोप लगाए—“जनजातीय परम्पराओं में लड़ाई में पैसा खर्च हो गया होगा या हथियार खरीद हो गई होगी”—जो पूरी प्रक्रिया को पटरी से उतार दिया।
- इससे audit की मांग हुई, और यह संपूर्ण मामला ठप हो गया।
फिर भी:
- 2025 की शुरुआत में दूसरी किश्त, जो बहतर दृष्टिकोण थी—पसंदीदा निर्णय लाया गया।
- फिर, सम्यूल ने USD एक मिलियन दिहाय (blood money) दिए—जो यमन के कानूनों के अंतर्गत अंतिम रास्ता है—परन्तु अभी तक मृतक के परिवार ने उसे स्वीकार नहीं किया है।
- परिणामतः, विधिक रूप से स्पष्ट माफ़ी (pardon) अभी तक मंज़ूर नहीं हुई।
👩👦 10. मानवता की मिसाल: एक माँ, एक मानव, एक संघर्ष
इस बीच, निमिषा की माँ हर हफ्ते जेल पहुँच रही हैं—संवार रही हैं कानूनी, राजनैतिक और भावनात्मक सूत्र।
उनकी तनहाइ में थिरकती शक्ति इस मामले की रूह है।
उनकी उपस्थिति एक मानव स्पंदन है—जो जन्म देती है निराशा में उम्मीद, अँधेरे में रोशनी, और दूर देश में भी नज़दीकियाँ।
मुझे यह कहना है—मैं निमिषा द्वारा की गई गलती माफ़ करने की वकालत नहीं कर रहा। मैं तालाल की मृत्युभोगी पहचान से लड़ने या उसके परिवार पर हमला नहीं कर रहा।
मगर:
- निमिषा, एक छोटे से गाँव की नर्स, जिसने बड़े सपने देखे—
- पति टोमी और मिशेल के साथ, उन्होंने अपना खर्च कर एक नर्सिंग होम खोला—जो धुँध में डूब गया
- उनकी जीवन-कथा में उधार, सप्नों की तबाही, घर का उजड़ना, इस सबके बीच एक लड़ाई फिर भी शुरू रही।
- टोमी की पीड़ा मैंने महसूस की। मिशेल की चुप्पियाँ मैंने सुनी। प्रेमा कुमारी की तन्हा आँखों ने मुझे बताया कि ये कहानी मेरे साथ कौन-कौन से सहयोगी के रूप में जुड़ कर चल रही है।
🌈 11. क्या अब हमारा संघर्ष रंग लाएगा?
इसी समय, empathetic diplomacy, संयुक्त अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप, स्थानीय बुद्धि, भारतीय माँ का अदम्य धैर्य, और कुछ हद तक अंतरराष्ट्रीय समर्थन—सब एक सूत्र में बंध रहा है।
आगे की राह यही है:
- दिहाय को स्वीकृति दिलाने के लिए पारिवारिक वार्ता
- जनजातीय पहल और शासकीय संवाद तेज़ करना
- भारत सरकार से निरंतर दबाव बनाना—एनआरआई मानवता की गतिशीलता थीम
- निमिषा की बेटी को आत्मीय समर्थन—जो दूर से ही ग्रहण हो रही है
इस सभी अभूतपूर्व कहानी में—जब एक पति अपनी पत्नी को बचाने को जिद करता है, एक माँ अपनी बेटी को बचाने चाहे तो वह कैसे दृढ़ बनती है, और विदे—नसीब—न्याय—भी किस-किस सीमा तक मदद करते हैं—ये सब मानवीय कहानी का एक नया चैप्टर बनकर सामने आया है।
- एक छोटे गाँव से एक अंतरराष्ट्रीय इंस्पिरेशन—निमिषा की कहानी अंतरराष्ट्रीय न्याय, मानवाधिकार, संघर्ष, मातृत्व, और एक छोटी-सी उंगली ने पूरे मंडल को कैसे हिला दिया—उसकी मिसाल है।
- यह दिखाती है कि—“हमारी आवाज़”—अगर सच्ची हो और सशक्त हो—तो देश, भाषा, मानवता, न्याय—सभी सीमाएँ पार कर सकती है।
- यह लड़ाई अभी पूरी नहीं हुयी है। लेकिन हर दिन, हर कदम, एक माँ की कोशिश, एक मानव की आँखों की चमक, और एक विदेशन्याय प्रणाली की जड़—उस निष्कर्ष की ओर एक कदम बढ़ा रही है।
मानवीय संवेदना की इस विशाल गाथा को, निमिषा की धरती—नाकती नीहरी—चाहे वह जेल की दीवारों को रीढ़ देनेवाली थी या हम लोगों की हिम्मत बनानेवाली—हमें याद दिलाती है:
“जिंदगी पराजय नहीं मानती, हम मान लेते हैं क्योंकि एक रोज़ नींद हमें ठीक नहीं होने देती। उसे नींद से लड़ने की ज़रूरत है—और हम नींद से लड़ेंगे।”
समय है—जब न्याय, प्यार और अहिंसा की टक्कर—लड़ाई से जीत की ओर मोड़ दे।