AatmaNirbhar Bharat Mega Campaign: Pulses Self-Reliance Mission (2025–2031)

आत्मनिर्भर भारत का महाअभियान: दलहन आत्मनिर्भरता मिशन 2025-2031” 👇

Mission 2030 AatmaNirbhar Bharat भारत को दालों के आयात से मुक्ति दिलाने का ₹11,440 करोड़ का ‘पंच-मंत्र’ रोडमैप कैसे ‘दलहन आत्मनिर्भरता मिशन’ किसानों की आय और पोषण सुरक्षा की गारंटी बनेगा ?

क्या आप जानते हैं?

AatmaNirbhar Bharat :दलहन आत्मनिर्भरता मिशन ,भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता और आश्चर्यजनक रूप से, सबसे बड़ा आयातक भी है। AatmaNirbhar Bharat यह विरोधाभास हमारी खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती रहा है। लेकिन अब, एक ऐतिहासिक पहल इस तस्वीर को बदलने के लिए तैयार है।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 11 अक्टूबर, 2025 को ₹11,440 करोड़ के विशाल बजटीय आवंटन के साथ,AatmaNirbhar Bharat दलहन आत्मनिर्भरता मिशन’ (Mission for Aatmanirbharta in Pulses) का शुभारंभ किया है। यह सिर्फ एक कृषि योजना नहीं है, बल्कि पोषण सुरक्षा, ग्रामीण सशक्तिकरण और ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य की दिशा में एक ‘पंच-मंत्र’ पर आधारित राष्ट्रीय संकल्प है।

🌾 पहला अध्याय: क्यों जरूरी है यह महाअभियान? एक विरोधाभासी सच्चाई

भारत की थाली में दालें सिर्फ भोजन का हिस्सा नहीं, बल्कि प्रोटीन का सबसे किफायती स्रोत और शाकाहारी संस्कृति की रीढ़ हैं।

आत्मनिर्भर भारत का महाअभियान: दलहन आत्मनिर्भरता मिशन 2025-2031

📉 आयात पर निर्भरता की चुनौती : AatmaNirbhar Bharat

AatmaNirbhar Bharat :हर साल, देश की बढ़ती खपत को पूरा करने के लिए हमें करोड़ों टन दालों का आयात करना पड़ता है, जिस पर करोड़ों की विदेशी मुद्रा खर्च होती है।

  • वैश्विक जोखिम: आयात पर अत्यधिक निर्भरता हमें अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) में किसी भी व्यवधान के प्रति संवेदनशील बनाती है।

  • किसानों का नुकसान: सस्ते आयात के कारण घरेलू बाजार में दालों की कीमतों पर दबाव पड़ता है, जिससे किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता और वे दालों की खेती से दूर होने लगते हैं।

  • कुपोषण का संकट: दालें, विशेष रूप से अरहर (तुअर), उड़द और मसूर, प्रोटीन का पावरहाउस हैं। इनका कम उत्पादन सीधे तौर पर देश की पोषण सुरक्षा को प्रभावित करता है।

📈 मांग में निरंतर वृद्धि

भारत की जनसंख्या बढ़ रही है और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि से प्रोटीन की मांग भी बढ़ रही है। AatmaNirbhar Bharat इस बढ़ती मांग और सीमित उत्पादन के बीच के अंतर (Demand-Supply Gap) को पाटना इस मिशन का प्राथमिक लक्ष्य है।

📅 दूसरा अध्याय: मिशन का विशाल रोडमैप और महत्वाकांक्षी लक्ष्य |

AatmaNirbhar Bharat ‘दलहन आत्मनिर्भरता मिशन’ वित्तीय वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक, यानी छह वर्षों के लिए एक चरणबद्ध और व्यापक रोडमैप है।

🎯 AatmaNirbhar Bharat : मुख्य लक्ष्य (2030-31 तक)

विशेषतावर्तमान स्थिति (लगभग)मिशन का लक्ष्य (2030-31)
कुल उत्पादन~242 लाख टन350 लाख टन
खेती का क्षेत्र (रकबा)~275 लाख हेक्टेयर310 लाख हेक्टेयर
उत्पादकता (Yield)~881 किग्रा/हेक्टेयर1,130 किग्रा/हेक्टेयर
तुअर, उड़द, मसूर में आत्मनिर्भरतादिसंबर 2027 तक पूर्ण आत्मनिर्भरता 

यह मिशन मुख्य रूप से तुअर (अरहर), उड़द, और मसूर पर केंद्रित है, क्योंकि ये तीनों दालें कुल दलहन उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा हैं और आयात पर हमारी निर्भरता का मुख्य कारण हैं।

🌱 तीसरा अध्याय: पंच-मंत्र रणनीति – आत्मनिर्भरता की पाँच मुख्य धुरी

AatmaNirbhar Bharat : यह मिशन किसी एक रणनीति पर नहीं, बल्कि पाँच व्यापक और एकीकृत हस्तक्षेपों (‘पंच-मंत्र’) पर आधारित है, जो संपूर्ण कृषि मूल्य श्रृंखला (Agricultural Value Chain) को मजबूत करेंगे:

AatmaNirbhar Bharat :1. उन्नत बीज एवं प्रौद्योगिकी का पावरहाउस |

दलहन की उत्पादकता कम होने का एक मुख्य कारण पुराने बीज और तकनीकी अंतराल है। मिशन इस पर निर्णायक प्रहार करेगा।

  • मुफ्त बीज किट वितरण: किसानों को 88 लाख मुफ्त बीज मिनी-किट और 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज वितरित किए जाएंगे।

  • जलवायु-अनुकूल किस्में: ICAR और IIPR कानपुर जैसे संस्थानों के साथ मिलकर कम अवधि में पकने वाली, अधिक उपज देने वाली, और जलवायु-लचीली (Climate-Resilient) दालों की किस्मों पर शोध को बढ़ावा दिया जाएगा।

  • SATHI पोर्टल: बीज की गुणवत्ता और पता लगाने की क्षमता (Traceability) सुनिश्चित करने के लिए SATHI पोर्टल का उपयोग किया जाएगा।

2. खेती के रकबे का स्मार्ट विस्तार |

उत्पादन बढ़ाने के लिए केवल उपज बढ़ाना ही काफी नहीं, बल्कि खेती के तहत क्षेत्र को भी बढ़ाना होगा।

  • चावल-परती भूमि (Rice Fallows) का उपयोग: धान की कटाई के बाद खाली पड़ी लाखों हेक्टेयर ‘चावल-परती भूमि’ का उपयोग दलहन की खेती के लिए किया जाएगा।

  • फसल विविधीकरण (Crop Diversification): किसानों को धान और गेहूँ की अत्यधिक पानी चाहने वाली फसलों से हटाकर दलहन की ओर प्रोत्साहित किया जाएगा, खासकर भूजल की कमी वाले क्षेत्रों में।

  • अंतरफसलीकरण (Intercropping): गन्ना और तिलहन जैसी फसलों के साथ दलहन का अंतरफसलीकरण करने को बढ़ावा दिया जाएगा। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी (दलहनें नाइट्रोजन स्थिरीकरण करती हैं) और किसानों की आय में विविधता आएगी।

3. खरीद की 100% गारंटी: किसानों का सुरक्षा कवच |

किसानों के लिए सबसे बड़ा प्रोत्साहन है निश्चित और लाभकारी मूल्य। मिशन इस गारंटी को अभूतपूर्व तरीके से मजबूत करता है AatmaNirbhar Bharat।

  • MSP पर गारंटीशुदा खरीद: तुअर, उड़द और मसूर के लिए अगले चार वर्षों तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर 100% खरीद की गारंटी होगी।

  • PM-AASHA का मजबूत ढांचा: NAFED और NCCF जैसी केंद्रीय एजेंसियां, पंजीकृत किसानों से पूरी उपज की खरीद करेंगी, जिससे उन्हें बाजार के उतार-चढ़ाव से सुरक्षा मिलेगी।

  • क्लस्टर आधारित दृष्टिकोण: हस्तक्षेपों को प्रत्येक क्षेत्र की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुसार तैयार करने के लिए क्लस्टर-आधारित रणनीति अपनाई जाएगी।

4. फसल-पश्चात मूल्य श्रृंखला का निर्माण |

कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करना और मूल्यवर्धन (Value Addition) करना मिशन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।

  • 1000 प्रोसेसिंग यूनिट्स: सरकार 1,000 दाल प्रसंस्करण और पैकेजिंग इकाइयों की स्थापना में सहायता करेगी।

  • सब्सिडी और FPO समर्थन: प्रत्येक यूनिट के लिए ₹25 लाख तक की पूंजीगत सब्सिडी उपलब्ध होगी। किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को इन इकाइयों के प्रबंधन और संचालन के लिए विशेष समर्थन दिया जाएगा।

  • ग्रामीण रोजगार सृजन: स्थानीय प्रोसेसिंग इकाइयों के विकास से ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

5. बेहतर निगरानी और नीतिगत हस्तक्षेप |

एक मिशन को सफल बनाने के लिए मजबूत नीतिगत ढांचा और प्रभावी निगरानी आवश्यक है।

  • वैश्विक मूल्य निगरानी: अंतर्राष्ट्रीय बाजार में दालों की कीमतों पर नज़र रखने के लिए एक तंत्र स्थापित किया जाएगा, ताकि आयात की नीति किसानों के हितों को नुकसान न पहुँचाए।

  • डिजिटल लिंकेज: किसानों को मौसम, बाजार मूल्य और सरकारी योजनाओं की जानकारी देने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जाएगा।

आत्मनिर्भर भारत का महाअभियान: दलहन आत्मनिर्भरता मिशन 2025-2031

💰AatmaNirbhar Bharat : चौथा अध्याय: आर्थिक एवं सामाजिक प्रभाव – केवल उत्पादन से कहीं आगे

यह मिशन केवल संख्याएँ बढ़ाने का प्रयास नहीं है; यह एक गहन सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन लाने का माध्यम है।

📈 किसानों की आय में स्थायित्व

  • जोखिम में कमी: MSP पर खरीद की गारंटी किसानों के लिए एक ‘सुरक्षा जाल’ (Safety Net) का काम करेगी, जिससे वे दालों की खेती अधिक आत्मविश्वास के साथ कर सकेंगे।

  • कम इनपुट लागत: दालों को कम पानी और उर्वरक की आवश्यकता होती है। मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने की क्षमता के कारण ये किसानों के लिए कम इनपुट, उच्च लाभ वाली फसलें हैं।

🛡️ पोषण सुरक्षा को मजबूती

दालें सस्ती दर पर प्रोटीन उपलब्ध कराती हैं। घरेलू उत्पादन में वृद्धि होने से सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और स्कूल भोजन कार्यक्रमों में दालों को आसानी से शामिल किया जा सकेगा, जिससे कुपोषण के खिलाफ लड़ाई मजबूत होगी।

🌍 पर्यावरण और मिट्टी का स्वास्थ्य

दलहन की खेती सतत कृषि (Sustainable Agriculture) को बढ़ावा देती है। ये फसलें मिट्टी की सेहत सुधारती हैं, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करती हैं, और जल संरक्षण में सहायक होती हैं।


🚀 निष्कर्ष: आत्मनिर्भरता की दहलीज पर भारत

दलहन आत्मनिर्भरता मिशन भारत के कृषि क्षेत्र के लिए एक निर्णायक मोड़ है। यह एक दूरदर्शी पहल है जो एक साथ कई चुनौतियों का समाधान करती है – खाद्य सुरक्षा, किसान समृद्धि, पोषण और पर्यावरण संरक्षण।

₹11,440 करोड़ का यह निवेश एक संकेत है कि सरकार किसानों की आय को दोगुना करने और देश को दालों के आयात की बेड़ियों से मुक्त करने के लिए प्रतिबद्ध है।

यदि ‘पंच-मंत्र’ रणनीति को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो भारत न केवल 2030-31 तक 350 लाख टन दालों का उत्पादन करेगा, बल्कि दिसंबर 2027 तक तुअर, उड़द और मसूर में पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर बनने का लक्ष्य भी हासिल कर लेगा।

यह मिशन भारत को दुनिया के सबसे बड़े आयातक से वैश्विक दलहन शक्ति के रूप में स्थापित करने की क्षमता रखता है। दालों की यह यात्रा केवल आत्मनिर्भरता की नहीं, बल्कि स्वस्थ भारत और सशक्त किसान की भी यात्रा है।

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