ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2025: मध्य पूर्व तनाव, टैरिफ विवाद और वैश्विक आर्थिक चुनौतियाँ
2025 का ब्रिक्स शिखर सम्मेलन एक बार फिर वैश्विक राजनीति और आर्थिक बदलावों के केंद्र में रहा। इस बार का आयोजन ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में हुआ, जहां ब्रिक्स समूह ने दुनिया के बदलते आर्थिक और भू-राजनीतिक परिदृश्य में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए कई अहम मुद्दों पर चर्चा की।
ब्रिक्स (BRICS) समूह – ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका – ने पिछले साल विस्तार करते हुए इंडोनेशिया, ईरान, मिस्र, इथियोपिया और संयुक्त अरब अमीरात जैसे नए सदस्यों को भी शामिल किया। यह विस्तार इस समूह की महत्वाकांक्षा को दर्शाता है कि वह विकसित देशों के प्रभुत्व वाली वैश्विक व्यवस्था के मुकाबले एक वैकल्पिक वैश्विक मंच के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहता है।
दो महत्वपूर्ण नेताओं की अनुपस्थिति में हुए शिखर सम्मेलन
हालांकि यह शिखर सम्मेलन बहुत बड़ा था, लेकिन इसके दो सबसे महत्वपूर्ण सदस्य देशों के शीर्ष नेता इसमें शरीक नहीं हुए। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, जो 2012 से लगातार ब्रिक्स सम्मेलनों में शामिल होते आए थे, इस बार व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हुए और केवल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बातचीत की। वहीं रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, जो विदेश यात्रा से बच रहे हैं, अपनी उपस्थिति नहीं दे पाए क्योंकि उनके खिलाफ यूक्रेन पर आक्रमण के चलते अंतरराष्ट्रीय गिरफ्तारी वारंट जारी हैं।
यह स्थिति स्पष्ट करती है कि ब्रिक्स समूह आज वैश्विक तनावों और राजनीतिक उलझनों के बीच संतुलन बनाने की जद्दोजहद कर रहा है।
मध्य पूर्व की गंभीर स्थिति पर ब्रिक्स का रुख
मध्य पूर्व के हालात इस बार के सम्मेलन की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थे। गाजा में बढ़ती हिंसा और मानवीय संकट को लेकर ब्रिक्स ने गहरा चिंता जताई। विशेष रूप से ईरान के खिलाफ हाल ही में बढ़े टैरिफ और हमलों की निंदा की गई, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का नाम लिए बिना। यह कदम समूह की वैश्विक राजनीतिक सजगता और संतुलन बनाए रखने की कोशिश को दर्शाता है।
ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की गैरमौजूदगी में उनके विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने बैठक में भाग लिया। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्यों से इजरायल की निंदा करने की अपील की और कहा कि अमेरिका और इजरायल को क्षेत्रीय संकट के लिए जवाबदेह ठहराना होगा। अराघची ने स्पष्ट किया कि युद्ध के प्रभाव सिर्फ गाजा तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि पूरे क्षेत्र और उससे बाहर भी गंभीर नुकसान होंगे।
ब्रिक्स ने सभी बंधकों की रिहाई की मांग की, वार्ता की मेज पर लौटने का आह्वान किया, और दो-राज्य समाधान की प्रतिबद्धता दोहराई। हालांकि, अराघची ने बाद में कहा कि दो-राज्य समाधान विफल रहा है और यह आगे भी सफल नहीं होगा।
इस बीच रूस ने भी अमेरिका और इजरायल के नाम लेकर ईरान पर हमलों की निंदा की, जो इस समूह की आपसी जटिल राजनीतिक समीकरणों का परिचायक है।
टैरिफ में वृद्धि को लेकर गंभीर चिंता
ब्रिक्स ने अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ वृद्धि के फैसले को विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के खिलाफ बताया और इसके खिलाफ “गंभीर चिंताएं” जताईं। समूह का मानना है कि इन टैरिफ प्रतिबंधों से वैश्विक व्यापार में कमी, सप्लाई चेन में बाधा और अनिश्चितता बढ़ेगी।
यह अप्रत्यक्ष आलोचना अमेरिका के आर्थिक संरक्षणवाद की ओर इशारा करती है, जो विकसित देशों की आर्थिक दबदबे को चुनौती दे रही है। पिछले वर्षों में ट्रम्प प्रशासन ने विशेष रूप से चीन और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर भारी टैरिफ लगाए थे, जिससे वैश्विक व्यापार तनाव बढ़ा था।
ब्रिक्स के सदस्य देशों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे वैश्विक व्यापार के नियमों का सम्मान करें ताकि आर्थिक सहयोग और स्थिरता बनी रहे।
सैन्य खर्च और युद्ध के खिलाफ ब्राजील का संदेश
ब्राजील के राष्ट्रपति लुईस इनासियो लूला दा सिल्वा ने नाटो के 2035 तक वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 5% तक सैन्य खर्च बढ़ाने के फैसले की तीव्र आलोचना की। उन्होंने कहा कि “युद्ध में निवेश करना शांति की तुलना में हमेशा आसान होता है।” यह बयान इस बात को रेखांकित करता है कि ब्रिक्स समूह युद्ध को नहीं, बल्कि शांति और विकास को प्राथमिकता देना चाहता है।
यहां ब्राजील का रुख वैश्विक तनावों और सैन्य प्रतिस्पर्धा को कम करने का एक प्रयास है, खासकर तब जब विश्व कई बड़े संकटों से गुजर रहा है।
ब्रिक्स का आंतरिक समन्वय और विस्तार
ब्रिक्स के सदस्य देशों में विविधता और विस्तार के कारण समूह को अब अपने आंतरिक एकजुटता और समन्वय को बढ़ावा देने की जरूरत है। नए सदस्यों को बेहतर तरीके से एकीकृत करने के लिए ब्राजील ने घरेलू मुद्दों को एजेंडे में शामिल किया है।
साओ पाओलो विश्वविद्यालय के ब्रिक्स अध्ययन विशेषज्ञ ब्रूस शेइडल के अनुसार, हालांकि शीर्ष नेताओं की अनुपस्थिति ने सम्मेलन की शक्ति को कम किया है, फिर भी यह बैठक वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के बीच ब्रिक्स को एक वैकल्पिक मंच के रूप में स्थापित करने का महत्वपूर्ण मौका है।
उनका मानना है कि यह शिखर सम्मेलन उभरते देशों को अपनी आर्थिक साझेदारियों को विविधता देने और वैश्विक दबावों से बचने का अवसर देता है।
वैश्विक स्वास्थ्य और पर्यावरण: ब्रिक्स की नई प्राथमिकताएँ
इस बार के सम्मेलन में केवल आर्थिक और राजनीतिक मुद्दे ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य और पर्यावरण के संरक्षण जैसे विषयों पर भी ध्यान दिया गया। ब्राजील की घरेलू राजनीति की जटिलताओं और ट्रम्प प्रशासन के संभावित वापसी की पृष्ठभूमि में, समूह ने कम विवादास्पद मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने का निर्णय लिया।
साथ ही, जलवायु परिवर्तन को लेकर इस बैठक ने अपनी प्रतिबद्धता दिखाई। यह सम्मेलन 2025 के अंत में अमेज़न के शहर बेलेम में आयोजित होने वाली COP 30 जलवायु वार्ता से पहले जलवायु संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण मंच रहा।
मानवाधिकारों और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों ने भी सम्मेलन के दौरान सक्रिय भागीदारी की।
निष्कर्ष: ब्रिक्स – एक नया वैश्विक विकल्प या संघर्ष का मैदान?
ब्रिक्स समूह आज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। यह केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह नहीं रह गया है, बल्कि एक ऐसा वैश्विक मंच बन गया है जो विश्व के आर्थिक और राजनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
मध्य पूर्व के तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध, अमेरिकी टैरिफ नीतियाँ, और विश्व आर्थिक अस्थिरता के बीच ब्रिक्स ने अपने स्वरूप को स्थिर करने और वैश्विक व्यापार और शांति को बढ़ावा देने की कोशिश की है।
फिर भी, नेतृत्व की कमी, विभिन्न देशों के अलग-अलग हित, और वैश्विक दबाव इस समूह के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि ब्रिक्स को एकजुट होकर विश्व में एक स्थिर और प्रभावशाली भूमिका निभानी होगी, नहीं तो यह समूह अपने बड़े सपनों को पूरा नहीं कर पाएगा।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2025 ने यह साबित कर दिया कि वैश्विक राजनीति में शक्ति का नया समीकरण बन रहा है, जिसमें पुरानी शक्तियां और नए खिलाड़ी दोनों शामिल हैं। भविष्य में इस समूह की भूमिका विश्व की दिशा तय करने में और अहम साबित होगी।