India from Space: Astronaut’s Grand Vision & Emotional Chat with PM Modi

कल्पना कीजिए, आप सैकड़ों किलोमीटर ऊपर, पृथ्वी की नाजुक नीली परत के ऊपर तैर रहे हैं। नीचे महाद्वीप, महासागर और बादलों का सम्मोहक नृत्य चल रहा है। और फिर, उस विशाल नीले संगमरमर पर, आप अपने देश को पहचान लेते हैं – भारत। यही अनुभव था हमारे ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला का, जब उन्होंने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बातचीत की। यह सिर्फ एक संवाद नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक क्षण था, जो हमें अतीत की याद दिलाता है और भविष्य के सपने दिखाता है। आइए, इस अद्भुत यात्रा में शामिल होते हैं।

एक ऐतिहासिक प्रतिध्वनि: “सारे जहां से अच्छा…”

हमारी कहानी शुरू होती है 41 साल पहले, 1984 में। भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री विंग कमांडर राकेश शर्मा सोवियत सोयुज अंतरिक्ष यान से पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने उनसे एक सरल, मगर गहरा सवाल पूछा: “अंतरिक्ष से भारत कैसा दिखता है?” राकेश शर्मा का जवाब, जो सदियों पुरानी भावना को जीवंत कर देने वाला था: “सारे जहां से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा।” ये शब्द केवल एक देश की सुंदरता के बारे में नहीं थे; वे एक भावना, एक गर्व, और एकता का प्रतीक बन गए। यह वह पल था जब भारत ने पहली बार आकाश की ऊंचाइयों से अपने आप को देखा था।

और अब, जून 2025 में, इतिहास खुद को दोहरा रहा था, मगर एक नए अध्याय के साथ। ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला, अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर विराजमान थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सवाद भी वही था, मगर शुभांशु का जवाब इस नए युग की गूँज लिए हुए था: “प्रधानमंत्री जी, यहाँ से भारत बहुत भव्य और बहुत बड़ा दिखता है। अनेकता में एकता का भाव साकार होता दिखता है।”

राकेश शर्मा के “सारे जहां से अच्छा” और शुभांशु शुक्ला के “भव्य और बड़ा” – ये दोनों वाक्य भारत की यात्रा के दो पड़ाव हैं। पहला सपना देखने का, दूसरा उस सपने को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का।

शुभांशु शुक्ला: अंतरिक्ष में भारत का नया चेहरा

शनिवार का वह दिन (28 जून 2025) भारतीय अंतरिक्ष इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया। लगभग 17 मिनट तक चली इस ऐतिहासिक वीडियो कॉन्फ्रेंस में शुभांशु शुक्ला ने न सिर्फ अंतरिक्ष से जुड़े अपने अनूठे अनुभव साझा किए, बल्कि वहाँ लगाए गए भारतीय तिरंगे के प्रति अपना अटूट गर्व और देश की प्रगति के प्रति अपना विश्वास भी व्यक्त किया।

“यह बिल्कुल नया अनुभव है, प्रधानमंत्री जी,” शुभांशु ने कहा, उनकी आवाज़ में उत्साह और विस्मय साफ झलक रहा था। “यहाँ हो रही चीजें साफ दिखाती हैं कि हमारा भारत किस दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह सिर्फ मेरी यात्रा नहीं है; पृथ्वी से लेकर इस ऑर्बिट (कक्षा) तक की ये 400 किलोमीटर की छोटी सी यात्रा मेरे देश की भी यात्रा है।”

ये शब्द महज वाक्य नहीं थे; ये उस आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति थे जो नए भारत में पल रहा है। शुभांशु ने आगे कहा, “मैं जब छोटा था, तो कभी सोच भी नहीं पाया था कि मैं अंतरिक्ष यात्री बन सकता हूँ। लेकिन आज, आपके नेतृत्व में, भारत न सिर्फ ये मौका दे रहा है, बल्कि ऐसे सपनों को साकार करने का अवसर भी दे रहा है। यह मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। मुझे बेहद गर्व हो रहा है कि मैं यहाँ अपने देश का प्रतिनिधित्व कर पा रहा हूँ।”

पीएम मोदी का स्नेह और “गाजर का हलवा” का जादू

प्रधानमंत्री मोदी की बातचीत सिर्फ औपचारिकता नहीं थी; उसमें एक पिता तुल्य स्नेह और गहरी दिलचस्पी झलक रही थी। उन्होंने न सिर्फ शुभांशु का उत्साह बढ़ाया, बल्कि उन्हें भारत के भविष्य के अंतरिक्ष संकल्पों – गगनयान, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन, चंद्र मिशन – का साझेदार बनने का आह्वान भी किया।

और फिर आया वह मनमोहक पल! प्रधानमंत्री मोदी ने मुस्कुराते हुए पूछा, “आप अपने साथ जो गाजर का हलवा ले गए थे, क्या वह अपने साथियों को खिलाया?” यह साधारण सा सवाल असाधारण था। यह दिखा रहा था कि पीएम शुभांशु की यात्रा की छोटी-छोटी तैयारियों के बारे में भी कितनी करीबी से जानते हैं। गाजर का हलवा – भारतीय पारंपरिक मिठाई – अंतरिक्ष में पहुँचकर सिर्फ मिठाई नहीं रह गई थी, वह भारतीयता का, घर का प्रतीक बन गया था। इस सवाल ने संवाद को एक आत्मीयता से भर दिया।

अंतरिक्ष का अद्भुत संसार: 16 सूर्योदय और 28,000 किमी/घंटा!

शुभांशु शुक्ला ने अंतरिक्ष स्टेशन के अपने जीवन के कुछ ऐसे पहलू साझा किए जो सुनने वालों को हैरान कर देने वाले थे:

  1. प्रकृति का अद्भुत खेल – 16 बार सूर्योदय/अस्त: “हम यहाँ रोजाना 16 बार सूर्योदय और सूर्यास्त देखते हैं!” शुभांशु ने बताया। कल्पना कीजिए, हर 90 मिनट में पृथ्वी का एक चक्कर लगाने वाले आईएसएस पर सवार यात्री हर 1.5 घंटे में सूरज को उगते और डूबते देखते हैं। यह प्रक्रिया इतनी तेज और लगातार होती है कि वह मन को मंत्रमुग्ध कर देती है – एक ऐसा नज़ारा जो पृथ्वी पर किसी के लिए संभव नहीं।

  2. अविश्वसनीय गति: 28,000 किलोमीटर प्रति घंटा! शुभांशु ने बताया कि अंतरिक्ष स्टेशन पृथ्वी का चक्कर 28,000 किलोमीटर प्रति घंटा की चौंका देने वाली रफ्तार से लगाता है। उन्होंने इस गति को भारत की प्रगति से जोड़ते हुए कहा, “यह गति दिखाती है कि हमारा देश कितनी तेजी से आगे बढ़ रहा है। और हमें यहीं नहीं रुकना है, हमें और आगे जाना है।” यह टिप्पणी सिर्फ अंतरिक्ष यान की गति के बारे में नहीं थी; यह भारत के विकास पथ के प्रति उनके विश्वास का प्रतीक थी। यह सुनकर प्रधानमंत्री मोदी के मुंह से सहज ही निकल पड़ा – “वाह!”

अंतरिक्ष से भारत: भव्य, विशाल और ‘एकता में अनेकता’ का जीवंत नज़ारा

जब प्रधानमंत्री मोदी ने पूछा कि अंतरिक्ष की विशालता को देखकर सबसे पहला विचार क्या आया, तो शुभांशु का जवाब गहरा दार्शनिक और देशभक्ति से ओतप्रोत था:

“प्रधानमंत्री जी, जब पहली बार हम अंतरिक्ष में पहुँचे, तो सबसे पहला दृश्य पृथ्वी का ही था। और पृथ्वी को बाहर से देखकर मन में पहला ख्याल यही आया कि पृथ्वी बिल्कुल एक जैसी दिखती है। बाहर से कोई सीमा रेखा दिखाई नहीं देती।”

यह अवलोकन अंतरराष्ट्रीय एकता और पर्यावरणीय संवेदनशीलता का शक्तिशाली संदेश देता है। लेकिन फिर उन्होंने भारत के बारे में जो कहा, वह हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर देने वाला था:

“दूसरी बात, हम भारत को अक्सर मैप पर देखते-पढ़ते हैं। हमें बताया जाता है कि अन्य देश कितने बड़े हैं और भारत का आकार क्या है। लेकिन यहाँ से देखने पर पता चलता है कि वह धारणा पूरी तरह सही नहीं है! क्योंकि हम एक थ्री-डी (त्रि-आयामी) वस्तु को दो-आयामी (टू-डी) कागज पर दर्शाते हैं। प्रधानमंत्री जी, यहाँ से देखें तो भारत सच में बहुत भव्य और बहुत बड़ा दिखता है! जितना हम मैप पर देखते हैं, उससे कहीं ज्यादा बड़ा और विशाल! और सबसे बढ़कर, अनेकता में एकता का भाव सचमुच साकार होता हुआ दिखता है।”

ये शब्द किसी भारतीय के लिए सबसे बड़ा गौरवबोधक थे। यह सिर्फ भौगोलिक आकार के बारे में नहीं था; यह भारत की सांस्कृतिक विशालता, उसकी विविधता में निहित शक्ति और उसकी बढ़ती वैश्विक हैसियत के बारे में था। अंतरिक्ष से देखा गया भारत, मानचित्रों के सपाट दायरों से कहीं बड़ा और जीवंत था।

शून्य गुरुत्वाकर्षण: जीवन की नई परिभाषा

प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी पूछा कि अंतरिक्ष स्टेशन पर जाने वाले पहले भारतीय होने के साथ-साथ वहां की परिस्थितियों का सामना करना कैसा लग रहा है। शुभांशु ने खुलकर शून्य गुरुत्वाकर्षण (Zero-G) में जीवन की चुनौतियों और विचित्रताओं को साझा किया:

“प्रधानमंत्री जी, यहाँ सब कुछ बिल्कुल अलग है। हमने करीब एक साल की कड़ी ट्रेनिंग ली थी। सारे सिस्टम और प्रक्रियाओं के बारे में हमें पता था। लेकिन जैसे ही यहाँ आए, सब कुछ बदल गया। हमारा शरीर धरती के गुरुत्वाकर्षण में रहने का आदी हो जाता है। हमारी हर गतिविधि, हर हरकत उसी के इर्द-गिर्द घूमती है। यहाँ (शून्य गुरुत्वाकर्षण में), छोटी-छोटी चीजें भी बहुत बड़ी चुनौती बन जाती हैं।”

उन्होंने मजाकिया अंदाज में बताया, “जैसे अभी आपसे बात करते समय, मुझे अपने पैरों को यहाँ बांधना पड़ रहा है, नहीं तो मैं ऊपर उड़ जाऊंगा!” यह छोटा सा विवरण अंतरिक्ष में जीवन की मूलभूत अलगाव को समझने के लिए काफी था।

फिर उन्होंने सबसे रोचक अनुभव बताया – सोना! “सोना तो यहाँ सबसे बड़ी चुनौती है, प्रधानमंत्री जी। आप छत पर सो सकते हैं, दीवार से चिपककर सो सकते हैं, या फर्श पर… असल में, कोई छत, दीवार या फर्श होता ही नहीं है जैसा हम धरती पर समझते हैं! आप कहीं भी, किसी भी ओर सो सकते हैं, बस खुद को बांधकर रखना होता है ताकि टकराएं नहीं।” यह वर्णन हमें अंतरिक्ष यात्रियों की दैनिक जीवन की अनोखी वास्तविकता से रूबरू कराता है।

भविष्य के संकल्प: गगनयान से चंद्रमा तक का सफर

संवाद का सबसे प्रेरणादायक हिस्सा तब आया जब प्रधानमंत्री मोदी ने भारत के अंतरिक्ष के भविष्य के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों की ओर इशारा किया और शुभांशु को उनका अहम हिस्सा बताया:

“हमें अपने मिशन गगनयान को आगे बढ़ाना है,” पीएम मोदी ने जोर देकर कहा। “हमें अपना खुद का स्वदेशी अंतरिक्ष स्टेशन बनाना है। हमें चंद्रमा पर भारतीय अंतरिक्ष यात्री की लैंडिंग भी करानी है। इन सभी महत्वाकांक्षी मिशनों में, आपका यह अनुभव, आपकी जानकारी, बहुत काम आने वाली है।”

उन्होंने आगे कहा, “भारत अब दुनिया के लिए अंतरिक्ष की नई संभावनाओं के द्वार खोलने जा रहा है। अब भारत सिर्फ अपनी उड़ान भरने वाला नहीं है; अब वह भविष्य की नई उड़ानों के लिए मंच तैयार करने वाला है।” ये वाक्य भारत की अंतरिक्ष नीति के बदलते फोकस को दर्शाते हैं – सिर्फ भागीदार बनने से लेकर नेतृत्वकर्ता और सक्षम मंच प्रदाता बनने तक।

युवाओं के नाम संदेश: सपने देखो, साहस करो, भारत बनाओ!

प्रधानमंत्री मोदी के कहने पर, शुभांशु शुक्ला ने देश के युवाओं के लिए एक ओजस्वी संदेश दिया:

“युवा साथियों, भारत आज जिस दिशा में जा रहा है, उसने हमें बहुत साहसिक और ऊंचे सपने देखने का हौसला दिया है। चांद, मंगल, अपना स्पेस स्टेशन – ये सिर्फ शब्द नहीं हैं, ये हमारे संकल्प हैं। लेकिन इन सपनों को पूरा करने के लिए सिर्फ वैज्ञानिकों या अंतरिक्ष यात्रियों की नहीं, बल्कि आप सभी की जरूरत है। हर क्षेत्र में – विज्ञान हो या प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग हो या चिकित्सा, कला हो या व्यवसाय – आपकी प्रतिभा, आपकी मेहनत और आपका जुनून ही देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा। सपने देखिए, बड़े सपने देखिए। मेहनत कीजिए, लगन से पढ़िए। और याद रखिए, आज का भारत आपके हर सपने को पंख देने को तैयार है। आप ही भविष्य के भारत के निर्माता हैं!”

“भारत माता की जय!” – अंतरिक्ष से गूंजी एकता की गर्जना

इस ऐतिहासिक संवाद का समापन उसी भावना के साथ हुआ जिसने इसे शुरू किया था – देशभक्ति और एकजुटता के साथ। प्रधानमंत्री मोदी ने अंत में “भारत माता की जय!” का उद्घोष किया। और अंतरिक्ष स्टेशन से, शून्य गुरुत्वाकर्षण में तैरते हुए, ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने तुरंत और गर्व से प्रतिध्वनित किया – “भारत माता की जय!”

यह नारा सिर्फ दो शब्द नहीं थे; यह एक प्रतीक था। यह धरती और आकाश के बीच एक भावनात्मक कड़ी थी। यह उस अटूट भावना का प्रमाण था जो हर भारतीय को, चाहे वह कहीं भी हो, एक सूत्र में बांधती है। यह आवाज़ अंतरिक्ष की निस्तब्धता में गूंजी और हर भारतीय के दिल में उतर गई।

नए क्षितिज की ओर उड़ान

शुभांशु शुक्ला का अंतरिक्ष स्टेशन से प्रधानमंत्री मोदी के साथ संवाद, सिर्फ एक बातचीत नहीं थी। यह एक ऐतिहासिक पुल था जो राकेश शर्मा के गौरवशाली अतीत को, भारत के वर्तमान आत्मविश्वास और भविष्य की असीम संभावनाओं से जोड़ता है।

  • राकेश शर्मा से शुभांशु शुक्ला तक: यह यात्रा भारत के अंतरिक्ष सफर की परिपक्वता को दर्शाती है – एक समय पर दूसरे के सहयोग से अंतरिक्ष में जाने वाला देश, अब स्वदेशी क्षमताओं (गगनयान) और वैश्विक सहयोग (आईएसएस मिशन) दोनों के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है।

  • “सारे जहां से अच्छा” से “भव्य और बड़ा” तक: यह केवल दृश्य का वर्णन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्म-छवि और वैश्विक हैसियत में आए बदलाव को दर्शाता है। भारत अब खुद को और बड़े, अधिक सशक्त और जिम्मेदारी भरे नजरिए से देख रहा है।

  • युवा सपनों का नया आकाश: शुभांशु का अपनी साधारण पृष्ठभूमि से अंतरिक्ष तक का सफर युवाओं के लिए एक जीवंत संदेश है – सपने देखो, मेहनत करो, और आज का भारत तुम्हें वह मंच देगा जहां से तुम आकाश छू सकोगे।

  • गगनयान, स्पेस स्टेशन, चंद्रयात्री: प्रधानमंत्री मोदी द्वारा रेखांकित ये लक्ष्य भारत के अंतरिक्ष विज्ञान के लिए नए युग की शुरुआत का संकेत देते हैं। यह सिर्फ अनुसंधान नहीं; यह राष्ट्रीय गौरव, तकनीकी स्वावलंबन और मानव जाति की ज्ञान यात्रा में भारत की अग्रणी भूमिका सुनिश्चित करने का संकल्प है।

अंत में: ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला की आवाज़, जो अंतरिक्ष की विशालता से निकलकर हम तक पहुँची, हमें याद दिलाती है कि हम कौन हैं और हम कहाँ जा रहे हैं। वह तिरंगा, जो आईएसएस पर लहरा रहा है, सिर्फ एक कपड़ा नहीं है; वह करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं, संघर्षों और जीत का प्रतीक है। जब हम रात के आकाश में तारों को देखें, तो याद रखें कि उनमें से कहीं न कहीं, एक भारतीय हमारे देश के भव्य दर्शन कर रहा है, और हम सबके लिए नए क्षितिज खोल रहा है। आइए, हम उस भविष्य को गढ़ने में अपना योगदान देने का संकल्प लें, जिसकी नींव आज अंतरिक्ष में पड़ रही है। जय हिंद!

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