Justice D.Y. Chandrachud on Housing & Special Needs

न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़: एक संवेदनशील और सच्चाई से भरा सफर

भारत के 50वें मुख्य न्यायाधीश रहे न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ एक ऐसे न्यायाधीश हैं, जिनकी न्यायप्रियता और मानवीय दृष्टिकोण ने न केवल न्यायिक दुनिया में बल्कि आम जनता के दिलों में भी एक खास जगह बनाई है। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम कार्यकाल के दिनों में एक संवेदनशील मुद्दा उठाया, जो न्यायपालिका के बाहर आम लोगों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है — सरकारी आवास की उपलब्धता और बच्चों की विशेष जरूरतों को समझना।

मुख्य न्यायाधीश का आवास: एक विवाद या आवश्यकता?

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ का नाम अक्सर उनके न्यायिक फैसलों के साथ जुड़ा रहता है, लेकिन हाल ही में वे अपने सरकारी आवास के मुद्दे को लेकर सुर्खियों में आए। सुप्रीम कोर्ट के आवास 5, कृष्ण मेनन मार्ग पर उनका निवास और उससे जुड़ी परिस्थितियां चर्चा का विषय बनीं। मीडिया रिपोर्ट्स में यह कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने सरकार से आग्रह किया था कि न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ को आवास खाली करने का आदेश दिया जाए। लेकिन जस्टिस चंद्रचूड़ ने स्पष्ट किया कि उनका इस सरकारी आवास में अनिश्चितकालीन रूप से रहने का कोई इरादा नहीं है।

उन्होंने कहा, “हम यहां अंतहीन रूप से नहीं रहने वाले हैं। मैंने यह स्पष्ट कर दिया था कि मैं अंतहीन रूप से नहीं रहने वाला हूं।” उनका कहना था कि वे केवल तब तक वहीं रहेंगे जब तक उन्हें अपना आवंटित सरकारी आवास नहीं मिल जाता। उन्होंने अपने सेवानिवृत्ति के बाद के आवास की व्यवस्था के लिए भी अपनी ओर से पूरी कोशिश की है।

विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए आवास की समस्या

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने इस पूरे मामले को जिस संवेदनशीलता से पेश किया, वह बहुत ही कम देखने को मिलता है। उन्होंने बताया कि दिल्ली में किराये के मकान ढूँढना उनके लिए इतना आसान नहीं था क्योंकि उनके दो बच्चे जिनकी आयु 16 और 14 साल है, विशेष आवश्यकताओं से पीड़ित हैं। उनकी बेटियां ‘नेमालाइन मायोपैथी’ नामक एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी से ग्रसित हैं, जिसके कारण उन्हें व्हीलचेयर की जरूरत पड़ती है।

उन्होंने बताया कि अधिकांश आधुनिक फ्लैटों के दरवाज़े व्हीलचेयर के लिए पर्याप्त चौड़े नहीं होते हैं। “यह बात कई लोगों को समझ नहीं आती कि विशेष जरूरत वाले बच्चों या बुजुर्गों के लिए आवास की व्यवस्था कितनी चुनौतीपूर्ण होती है। जब बाथरूम के दरवाज़े इतने संकरे हों कि व्हीलचेयर से गुजरना भी मुश्किल हो, तो जीवन कितना कठिन हो जाता है, इसका अंदाजा ही नहीं होता।”

जीवन की कठिनाइयों के बीच न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की एक अलग दुनिया

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ के जीवन में उनकी बेटियों की देखभाल एक बड़ी चुनौती है। बड़े प्रयासों के बावजूद, उन्हें अपनी बेटियों की सेहत के लिए एक बेसिक आईसीयू सुविधा भी घर पर स्थापित करनी पड़ी है। यह आवश्यक हो गया जब उनकी बड़ी बेटी को शिमला की यात्रा के दौरान श्वसन संबंधी गंभीर समस्या हुई, जिसके कारण उसे 44 दिनों तक आईसीयू में भर्ती रहना पड़ा।

ऐसे अनुभव न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश करते हैं, जो न्याय के पायदान पर रहने के साथ-साथ जीवन की गहराइयों को भी समझते हैं। वे केवल एक न्यायाधीश नहीं, बल्कि एक पिता और परिवार के मुखिया भी हैं, जो अपने बच्चों की विशेष जरूरतों को लेकर सचेत हैं।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ का सरकारी आवास पर विस्तारित प्रवास

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने बताया कि न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, जो उनके तत्काल उत्तराधिकारी थे, ने उन्हें 30 अप्रैल, 2025 तक 5, कृष्ण मेनन मार्ग पर रहने की अनुमति दी थी। लेकिन वे इस बात को लेकर चिंतित थे कि उनके पास जनवरी से ही दिल्ली में किराये के आवास की तलाश थी।

वे न्यायमूर्ति खन्ना को 28 अप्रैल को एक पत्र भी लिख चुके थे जिसमें उन्होंने समय विस्तार की मांग की थी। इसके बावजूद न्यायमूर्ति खन्ना का उस पत्र का कोई जवाब नहीं मिला। उस समय न्यायमूर्ति खन्ना मई 2025 में सेवानिवृत्त हो चुके थे।

इस बीच, सरकार ने उन्हें 3, मूर्ति मार्ग पर एक वैकल्पिक आवास आवंटित किया था, जो पहले सुप्रीम कोर्ट के पूल में था। कोर्ट ने इसे वापस कर दिया था क्योंकि जजों ने उसमें रहने से इंकार कर दिया था, इसकी मरम्मत और नवीनीकरण के कारण। सरकार ने आश्वासन दिया कि लोक निर्माण विभाग आवश्यक मरम्मत करेगा और 30 जून तक इसे सौंप दिया जाएगा।

दिल्ली में विशेष आवश्यकताओं के साथ आवास की समस्या और समाधान

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि वे निजी घर किराए पर लेने में सक्षम नहीं हैं क्योंकि मकान मालिक सामान्यतः लंबी अवधि के लिए मकान देते हैं, जबकि उन्हें केवल एक महीने के लिए आवास चाहिए।

उन्होंने कहा, “मैं एक साल के लिए घर लेने की विलासिता नहीं रखता क्योंकि मैं केवल एक महीने के लिए वहीं रहूंगा।”

इसके बावजूद, उन्होंने सेवायुक्त आवासों की खोज की, और होटलों से भी संपर्क किया, लेकिन अधिकतर स्थानों में सीढ़ियाँ थीं और कोई रैंप नहीं था, जिससे व्हीलचेयर से आवागमन असंभव हो जाता था। जब भी उन्हें अपनी बेटियों को ऐसे स्थानों पर ले जाना पड़ता था, तो उन्हें उन्हें उठाकर ले जाना पड़ता था। यह स्थिति विशेष रूप से तब कठिन हो जाती थी जब कर्मचारी कम होते और आपातकालीन स्थिति होती।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की संवेदनशीलता और न्यायपालिका की बारीकियां

उनका यह भी कहना था कि सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीशों को आवास या सेवा विस्तार देना कोई बड़ा उपकार नहीं होता। उन्होंने यह बात न्यायमूर्ति की गरिमा और उनके कर्तव्यों की गंभीरता को दर्शाते हुए कही।

वे कहते हैं, “हम न्यायाधीशों के तौर पर अपने अंतिम दिनों तक काम पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इतने वर्षों के बाद भी जब तक शहर में कहीं अपना घर न हो, हमें अपनी व्यवस्था करने में काफी समय लगता है।”

यह बयान न्यायपालिका में सेवा निवृत्त न्यायाधीशों की चुनौतियों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करता है। कई ऐसे उदाहरण हैं जब पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने आधिकारिक आवास में लंबे समय तक प्रवास किया, लेकिन न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ स्पष्ट करते हैं कि वे ऐसी छूट नहीं चाहते।

सेवानिवृत्ति के बाद की जिंदगी और नए सफर की शुरुआत

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद की चुनौतियों का भी जिक्र किया। वे कहते हैं कि वे दिल्ली में पैदा नहीं हुए हैं, वे एक बाहरी व्यक्ति हैं। वे खुद को पेशेवर सेवा बाजार में देखकर आशंकित हैं कि क्या वे अपनी योग्यता के अनुसार काम पा सकेंगे।

वे कहते हैं, “जब आप रिटायर होंगे, तो बहुत से लोग कहेंगे कि आप सलाहकार या मध्यस्थ के रूप में अच्छा काम करेंगे, लेकिन अंत में आप एक पेशेवर बाजार में हैं। मुझे यह जानना होगा कि मेरी आय कितनी होगी और मैं कहां खर्च कर सकता हूं।”

यह उन कई सवालों को उजागर करता है जो हर पेशेवर के मन में आते हैं जब वे एक लंबे करियर के बाद नई जिंदगी की शुरुआत करते हैं।

न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ की कहानी न केवल एक न्यायाधीश के जीवन की एक झलक है, बल्कि यह संवेदनशीलता, मानवता और समाज की वास्तविकताओं को समझने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। उनके अनुभव से पता चलता है कि न्यायपालिका के शीर्ष पर पहुंचने के बाद भी जीवन की जटिलताएं खत्म नहीं होतीं, बल्कि वे नए रूप लेती हैं।

उनके बच्चों की विशेष जरूरतें, आवास की समस्या और सेवानिवृत्ति के बाद की जिंदगी के प्रश्न हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि कैसे समाज, सरकार और संस्थान इस तरह की चुनौतियों को बेहतर तरीके से समझ और संबोधित कर सकते हैं।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ का यह स्पष्ट संदेश है कि सम्मान और सुविधा केवल पद या स्थान का मामला नहीं है, बल्कि यह हमारी संवेदनशीलता और एक-दूसरे की जरूरतों को समझने की क्षमता पर भी निर्भर करता है।

उनकी कहानी हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो अपने काम और जीवन में संतुलन बनाए रखना चाहता है और कठिनाइयों के बावजूद उम्मीद और संघर्ष का रास्ता चुनता है।

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