“भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनःस्थापना अधिनियम, 2013” (LARR Act, 2013) भारत सरकार की एक महत्वपूर्ण विधायी पहल है, जिसका उद्देश्य था—भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में जो लोग प्रभावित होते हैं, उन्हें उचित मुआवजा, पुनर्वास और पुनःस्थापना सुनिश्चित करना। इस कानून की संज्ञा आज भी विशेष रूप से ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में गहन है, जहाँ विकास कार्य चाहे वह सड़क परियोजना हो, बांध निर्माण या औद्योगिक क्षेत्र का विस्तार, प्रभावित समुदायों के भूमिहीन होने, आजीविका छिन जाने और सांस्कृतिक धरातल कमजोर पड़ जाने जैसे नुकसान होते हैं। ऐसे में अधिनियम का उद्देश्य—स्थानीय लोगों को मुआवजे के साथ न्याय, सुनवाई और भागीदारी देना—भी उतना ही ज़रूरी है।
हाल ही में केंद्र सरकार की “ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज” से संबंधित एक संसदीय स्थायी समिति में इस अधिनियम के प्रभाव, फायदा और पारदर्शिता को मजबूत करने पर चर्चा की जानी थी। इस चर्चा में समाज में बेहद सक्रिय दो हस्तियों—संवेदनशील सामाजिक कार्यकर्ता मेडाहा पाटकर और प्रतिष्ठित अभिनेता प्रकाश राज—को आमंत्रित किया गया था। परंतु कुछ सांसदों ने इनके नाम पर आपत्ति जताई और बैठक का बहिष्कार कर दिया। अंततः प्रभावशाली बहुमत नहीं हो पाने—क्वोरम की कमी—के कारण बैठक स्थगित करनी पड़ी।
यह लेख उन घटनाओं, विवादों, तर्कों और संभावित परिणामों का क्रमबद्ध विश्लेषण प्रस्तुत करता है, ताकि पाठक समझ सकें किस प्रकार हालिया घटनाक्रम ने इस अधिनियम के विकास एवं संशोधन प्रक्रिया में असर डाला है।
समिति और इसकी संरचना
इस स्थायी संसदीय समिति—जो “ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज” मंत्रालयों से संबंधित विभागों की निगरानी एवं रिपोर्ट तैयार करने के कार्य में लगी है—की अध्यक्षता कांग्रेस सांसद सप्तगिरी शंकर उलाका (ओडिशा, कोरापुट) कर रहे हैं। समिति में कुल 29 सदस्य हैं, जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा और भाजपा सहित अन्य प्रमुख दलों के सांसद शामिल हैं। इस समिति का कार्यकाल और उसकी प्रवृत्तियां देश के भूमि अधिग्रहण से जुड़े मुद्दों पर जनता की आवाज उठाने के लिए महत्वपूर्ण माध्यम रहीं हैं।
बैठक का उद्देश्य
बैठक आयोजित करने का उद्देश्य था:
भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनःस्थापना अधिनियम, 2013 के वर्तमान प्रवर्तन, उसकी कमियों, अपेक्षित सुधारों पर चर्चा करना।
ग्रामीण विकास, पर्यावरण, वन एवं जलवायु, आदिवासी मामलों जैसे संबंधित मंत्रालयों, संगठनों, विशेषज्ञों और गैर-सरकारी प्रतिनिधियों से विचार-विनिमय करना।
प्रभावित समुदायों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की आवाज़ संसद तक पहुँचाना और विधेयक में सुझावों के रूप में शामिल करना।
इस संदर्भ में मेडाहा पाटकर (नर्मदा बचाओ आंदोलन की मुखिया) और अभिनेता प्रकाश राज (जो सामाजिक न्याय के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं) को बैठक में आमंत्रित किया गया, ताकि उनकी विचारधारा और अनुभव से समिति को मदद मिले।
बैठक की शुरुआत और विवाद
जब बैठक शुरू हुई—जिसमें पहले मंत्रालयों और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों की ओर से प्रस्तुतियाँ शुरू हो रही थीं—तभी कुछ सांसदों ने बैठक में मौजूद पाटकर और प्रकाश राज को लेकर आपत्तियाँ शुरू कर दीं।
भाजपा के कई सांसदों (जिनमें बिहार के संजय जायसवाल भी शामिल थे) ने रोष प्रकट किया कि पाटकर और प्रकाश राज की उपस्थिति “यहाँ की कार्यवाही की प्रकृति और उद्देश्य” के अनुकूल नहीं थी।
उन्होंने आरोप लगाया कि पाटकर आज तक नर्मदा बचाओ आंदोलन में मिली उनके कार्यों के चलते विकास कार्यों को बाधित करती रही हैं, जिससे गुजरात समेत अन्य प्रदेशों को आर्थिक और पर्यावरणीय कठिनाइयाँ झेलनी पड़ीं।
आरोप लगाया गया कि इन दो लोगों की प्रस्तुति बिना पूर्व सूचना और बिना कारण—देशहित में नहीं—सत्र को प्रभावित करेगी।
इस विरोध के चलते पूरे एक पक्ष ने बैठक का बहिष्कार कर दिया। बहुमत नहीं रहने के कारण—क्वोरम पूरी नहीं हुई—बैठक आगे नहीं बढ़ सकी।
प्रमुख वक्तव्यों का सारांश
इस अध्याय में हम उन प्रमुख बिन्दुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे, जो दोनों पक्षों—समाज कार्यकर्ता एवं राजनेता—के तर्कों में उभरे।
1. विपक्षी सांसदों की चिंता
संजय जायसवाल (भाजपा) ने कहा:
“हमें समझ नहीं आया कि पिछली रात दो लोगों को अचानक क्यों आमंत्रित किया गया; इनका अतिथि रूप कैसे स्वीकार्य है जब सभी अधिकारी पहले से निर्धारित थे।”
उन्होंने आगे कहा कि समिति के प्रोटोकॉल का उल्लंघन हुआ है और इससे कार्यवाही की विश्वसनीयता प्रभावित होगी।भाजपा के अन्य सदस्यों का कहना था कि पाटकर की नर्मदा आंदोलन जैसी गतिविधियाँ—जिसमें एक बड़ी परियोजना समय पर नहीं हो सकी थी—ने कम से कम एक-चौथाई गुजरात को सूखे की ओर धकेल दिया।
2. समिति अध्यक्ष सप्तगिरी उलाका की वकालत
सप्तगिरी उलाका ने कहा कि यह “सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता” हैं और उन्हें सुनना लोकतंत्र की आत्मा है।
उद्धृत बिंदु: पाटकर और प्रकाश राज को आमंत्रित सिर्फ सहमति-निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा बनाने के लिए था, ताकि सरकारी पक्ष के अलावा समाज का दृष्टिकोण भी प्रस्तुत हो।
उलाका ने स्पष्ट किया कि बैठक में लौटने की भी मंशा स्पष्ट कर दी थी। उन्हें गोपनीय रूप से ‘मन्त्रालयों द्वारा प्रस्तुति हुई’ गुप्त जानकारी साझा नहीं की गई थी।
3. अधिनियम का महत्व
यह अधिनियम प्रभावित लोगों को मुआवजा, पुनर्वास, पुनःस्थापना, पारदर्शिता और समाज-भागीदारी सुनिश्चित करता है।
आदिवासी-ग्रामीण क्षेत्रों में जहां सड़क, बांध या औद्योगिक विकास से जीवन प्रभावित होता है, वहां अधिकारों की रक्षा करना एक संवैधानिक जिम्मेदारी बन जाता है।
क्वोरम न होने के परिणाम
जैसे ही 11 सांसदों (जिनमें भाजपा, जेडीयू आदि शामिल थे) ने बहिष्कार किया, क्वोरम टूट गया।
इस कारण बैठक स्थगित करनी पड़ी और नई बैठक का समय 14 जुलाई, 2025 निर्धारित किया गया।
इसके चलते अधिनियम के प्रभाव का मूल्यांकन और उसमें संशोधन—जो समिति की प्राथमिकता थी—कतार में पीछे धकेल दिए गए।
सामाजिक कार्यकर्ताओं की भूमिका और बहस
मेडहा पाटकर
लंबे समय से नर्मदा नदी पर बांधों के विरुद्ध आवाज उठाने वाली पाटकर का दावा रहा है कि प्रभावित लोगों को उनका हिस्सा नहीं मिला, और उनमें बहुतों की आजीविका छिन गई थी।
सरकार रामबाण परियोजनाओं को “विकास” कहती है, लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता ऐसे प्रोजेक्ट को “विकास का सर्वनाश” मानते हैं।
उनके अनुसार, बांध की चपेट में आए लोगों को उचित मुआवजे के अलावा उनका सभ्य जीवन-दर सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए।
प्रकाश राज
अभिनेता एवं सामाजिक न्यायवादी प्रकाश राज ने कई मंचों पर स्थानीय लोगों की भागीदारी, पारदर्शिता और निगरानी तंत्र की जरूरत पर बल दिया है।
भारत में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में अक्सर राजनीतिक दबाव और उद्योगपतियों का प्रभाव देखा गया है, जिससे प्रभावित समुदायों को आवाज़ उठाने से हतोत्साहित किया गया है।
इन दोनों व्यक्तित्वों ने मिलकर समिति की इसी बैठक में योगदान देने वाला प्रस्ताव था कि:
मुआवजे के पैमानों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त बनाएं।
स्थानीय समुदायों को निर्णय-प्रक्रिया में शामिल करें।
आरटीआई और सार्वजनिक सुनवाई को अनिवार्य करें।
पुनर्वास के लिए उचित बजट एवं संसाधन खर्च हों।
विरोधियों का पक्ष
नीतिपक्षीय सांसदों का कहना था कि बैठक भाजपा-सरकार द्वारा संचालित थी और इसमें दो ‘उल्टे व्यक्ति’ को शामिल करना उनकी विधि सम्मत प्रक्रिया में खलल पैदा करेगा।
उन्होंने यह भी कहा कि दो स्थानीय NGO प्रतिनिधियों के बीच इस हम-विरोध को भावनात्मक रूप से उठाने से संसदीय प्रक्रिया कमजोर होती है।
उनके अनुसार यह समाज कार्यकर्ता केवल दोषारोपण कर रहे हैं और बैठक में उपस्थिति ‘जागरूकता प्रदर्शक’ घटनाओं से अधिक राजनीतिक तहत-उठाव जैसा बनने लगी हैं।
उलाका का प्रत्युत्तर और लोकतांत्रिक तर्क
समिति अध्यक्ष ने जोर देकर कहा कि:
ऐसा किया जाना “स्वाभाविक”, “समावेशी” और “लोकतांत्रिक” प्रक्रिया का हिस्सा है।
इससे विपक्ष के कहने पर भी बहुमत द्वारा निर्णय किया जा सकता था, न कि अधर में सहमति के नाम पर बहस को रोका जाए।
पाटकर और प्रकाश राज को विचार विमर्श के लिए बुलाया गया था, न कि उन्हें सरकारी पक्ष का समर्थन करने या रोकने के लिए।
उलाका ने यह भी कहा कि:
यह प्रक्रिया “बहस के लिए खुली बहस” थी।
यदि उन्हें किसी विवादास्पद मुद्दे पर बोलना हो, तो “संसदीय बहस और चर्चाओं से बेहतर यही मंच हो सकता है”।
आगे क्या?
नई बैठक 14 जुलाई, 2025 को संभवतः फिर से संसदीय समिति द्वारा आयोजित की जाएगी।
इसमें अपेक्षा है कि:
प्रस्तावित आमंत्रण सूची सार्वजनिक की जाए।
सभी पक्षों को सुनने का प्रयास होगा।
यदि मीडिया निगरानी संभव हो, तो पारदर्शिता बढ़ेगी।
इस अधिनियम में जनता और प्रभावित पक्षों के सुझाव सम्मिलित होंगे।
आगे की कार्रवाई में—जैसे अधिनियम में संशोधन, सरकारी रिपोर्टिंग या लोक-राय—इस बैठक का स्वरूप निर्णायक साबित होगा।
समग्र निष्कर्ष
इस पूरे वादविवाद ने एक महत्वपूर्ण सवाल को जन्म दिया:
क्या संसदीय समितियों को केवल सरकारी पक्ष की आवाज़ सुननी चाहिए, या उन्हें सिविल सोसायटी के विचार-विमर्श को भी मंच देना चाहिए?
क्या ग्रामीण, गरीब और आदिवासी समुदायों की भागीदारी विधायी प्रक्रिया का गहन हिस्सा होना चाहिए?
और क्या मीडिया और नागरिकों की नजरें इन प्रक्रियाओं पर हों, ताकि निर्णय पारदर्शी और न्यायसंगत हों?
यदि विधान-प्रक्रिया केवल सरकारी प्रस्तुति या राजनैतिक दलों तक सीमित रह जाए, तो प्रभावित पक्षों की आवाज़ें—जो ज़मीनी सच्चाई से जुड़ी होती हैं—अनसुनी रह जाती हैं। वहीं, यदि सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्वतंत्र विशेषज्ञों को बिना पूर्व सूचना दिए आमंत्रित किया जाए, तो राजनीति उसका भार उठा जाती है और बहस विवादों में उलझ जाती है। महत्वपूर्ण यह है कि समिति की नई बैठक—जुलाई 14 की—एक साक्ष्यात्मक और संतुलित मंच बने, जिसमें सभी पक्षों की आवाज़ सुनी जाए और एक निष्पक्ष परियोजना रिपोर्ट तैयार हो।
निष्कर्ष
भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनःस्थापना अधिनियम, 2013 एक संवेदनशील, कई दृष्टिकोण समाहित करने वाला कानून है।
संसद की स्थायी समिति में इस पर बहस देश के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि—विकास और पारम्परिक जीवन शैली के बीच संतुलन बनाना एक सजग लोकतांत्रिक चुनौती है।
इस विवाद में संसदीय प्रक्रिया, राजनीतिक दल, सामाजिक कार्यकर्ता, प्रभावित जनता और मीडिया—यह सभी केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं।
इस बहस ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में विविधता और बहस की महत्ता है, पर उसे कैसे जिम्मेदार ढंग से संचालित करें, यह भी सीखने योग्य है।
आशा है इस विशद और संवेदनशील पुनर्लेखन से पाठक को ना केवल घटनाओं की सजीवता और पारदर्शिता का अनुभव हो पाएगा, बल्कि समीकरणों की जटिलता, विधायी प्रक्रिया के महत्व और सामाजिक न्याय की दस्तक को भी वे बेहतर समझ सकेंगे।